घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा

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घरेलू हिंसा पीह़ित के घरेलू दायरे में किसी व्यक्ति द्वारा की गई हिंसा है। इसमें साझेदार और पूर्व साझेदार, तत्काल पररवार के सदस्य, अन्य रिश्तेदार पारवारिक मित्र शामिल है । ‘घरेलू हिंसा’ शब्द का प्रयोग तब किया जाता है जब अपराधी और पीड़ित के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है !

बहन बेटी तो इन शैतानो के घर में जरूर होंगी फिर ये दूसरे की बहन बेटी को हर दिन क्यों ऐसे सताते है एक खुशहाल परिवार को क्यों ये दुखो में दबाते है|

घरेलू हिंसा क्या है ?

शारीरिक दुर्व्यवहार अर्थात शारीरिक पीड़ा, घरेलू,या जीवन या अंग या स्वास्थ्य को खतरा या लैंगिक दुर्व्यवहार अर्थात महिला की गरिमा का उल्लंघन, अपमान या तिरस्कार करना या अतिक्रमड़ करना या मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार अर्थात अपमान, उपहास, गाली देना या आर्थिक दुर्व्यवहार अर्थात या वित्तीय संसाधनो , जिसकी वह हक़दार है , से वंचित करना,मानसिक रूप से परेशान करना ये सभी घरेलू हिंसा कहलाते है |

इस कानून के तहत घरेलू हिंसा के दायरे में अनेक प्रकार की हिंसा और दुव्यवविार आते है किसी भी घरेलू सम्बन्ध या नातेदारी में किसी प्रकार का व्यव्हार, आचरण या बर्ताव जिससे (१) आपके स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, या किसी अंग को कोई क्षति पहुँचती है , या (२) मानसिक या शारीरिक हानि होती है घरेलू हिंसा है !

इसके अलावा घरेलू सम्बन्धो या नातेदारी में, किसी भी प्रकार का

  • शारीरिक दुरुपयोग (जैसे मार-पीट करना, थप्पड़ मारना, दांत काटना, ठोकर मारना, लात मारना इत्यादि ),
  • लैंगिक शोषण (जैसे बलात्कार अथवा बलपूर्वक बनाए गए शारीरिक सम्बन्ध, अश्लील साहित्य या सामग्री देखने के लिए मजबूर करना, अपमानित करने के दृहिकोण से किआ गया लैंगिक व्यव्हार , और बालकों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार),
  • मौखिक और भावनात्मक हिंसा ( जैसे अपमानित करना,गालिया देना,चरित्र और आचरण पर आरोप लगाना, लड़का न होने पर प्रताड़ित करना, दहेज़ के नाम पर प्रताड़ित करना, नौकरी न करने या छोड़ने के लिए मजबूर करना, आपको अपने मन से विवाह न करने देना या व्यक्ति विशेष से विवाह के लिए मजबूर करना, आत्महत्या की धमकी देना इत्यादि),
  • आर्थिक हिंसा ( जैसे आपको या आपके बच्चे को अपनी देखभाल के लिए धन और संसाधन न देना, आपको अपना रोज़गार न करने देना, या उसमें रुकावट डालना, आपकी आय, वेतन इत्यादि आपसे ले लेना, घर से बहार निकल देना इत्यादि), भी घरेलू हिंसा है |

कई महिलाएं न केवल खुद को परिवार में उपेक्षित समझती हैं, बल्कि अपने ही परिवार के उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार हो जाती हैं। यह एक घरेलू हिंसा है। १९४७ में, स्वतंत्रता के साथ, भारत में महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा दिया गया था। फिर भी वैवाहिक हिंसा के क्षेत्र में वे अपने अधिकारों का प्रभावी उपयोग करने में असमर्थ रही हैं।

  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है। कई महिलाओं को घर की चार दीवारी में अपराध और हिंसा का सामना करना पड़ता है। जाहिर है, हमारी सामाजिक स्थिति के कारण यह हिंसा महिलाओं पर ज्यादा होती है। इस हिंसा का असर पीड़ित महिला तक ही सीमित नहीं है बल्कि घर के बच्चे और बुजुर्ग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं. महिलाओं को अपनी अक्षमता, सामाजिक तंगी और पसंद की कमी के कारण लगातार इस स्थिति का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा हमारे समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता का प्रमाण है। इससे महिलाओं के जीवन, स्वतंत्रता और समानता के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के तमाम देशों ने इस हिंसा को रोकने की जिम्मेदारी स्वीकार की है. भारत ने सीडी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं।

यह समझौता दुनिया भर में महिलाओं पर सभी प्रकार की हिंसा और भेदभाव को रोकने के लिए किया गया है। जाहिर है, इस प्रतिबद्धता के चलते सरकार की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे प्रावधान और कानून बनाए, जिससे इस घरेलू हिंसा को रोका जा सके।

घरेलू हिंसा के कारण :-

  1. दहेज की मांग करना ।
  2. स्त्री को आत्मनिर्भर बनने से रोकना ।
  3. पुरुषवादी मानसिकता जो जिसे महिलाएं हीन समझती हैं।
  4. हिंसा को विवादों को निपटाने के तरीके के रूप में देखना ।
  5. महिलाओं की निरक्षरता, जिसके कारण उन्हें कानून की जानकारी नहीं है।
  6. हिंसा के खिलाफ प्रतिक्रिया की निष्क्रियता भी घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है।
  7. गरीबी के कारण आवश्यकता पूरी न होने पर परिवार में झगड़े होने लगते हैं।
  8. महिला उत्पीड़न का एक प्रमुख कारण पुरुषों पर महिलाओं की आर्थिक निर्भरता है।
  9. निम्न सामाजिक स्थिति के कारण महिलाओं को भी घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है।
  10. गलत लत जैसे- शराब पीने, नशा करने के कारण लोग घर में बेवजह मारपीट भी करते हैं।

घरेलू हिंसा की रिपोर्ट :-

कोई भी व्यक्ति जो जानता है कि किसी महिला पर घरेलू हिंसा हो रही है या हो रही है, ऐसी घटना की सूचना (संबंधित अधिकारी को) दे सकता है। अगर वह व्यक्ति सही जगह पर सूचना देता है तो उसे भी रिपोर्ट माना जाएगा। इस मामले में मुखबिर की कोई नागरिक या अपराधीक जिम्मेदारी नहीं होगी।

सरकार द्वारा इस कानून के तहत पीड़ित महिला को राहत देने और कानून का प्रभावी ढंग से पालन कराने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक जिले में कुछ अधिकारियों की नियुक्ति करेगी, जिनके स्पष्ट कर्तव्य और अधिकार होंगे। इसके लिए नियुक्त अधिकारियों का कर्तव्य होगा कि वह अन्याय और हिंसा के खिलाफ लड़ाई में पीड़ित महिला का सहयोग करें और उसकी रक्षा करें। सरकार निम्नलिखित अधिकारियों और संस्थानों की पहचान कर सकती है।

पुलिस अधिकारी –

हिंसा की घटना की सूचना उस थाने के पुलिस अधिकारी को दी जा सकती है जहां हिंसा की घटना हुई है, या जहां पीड़ित महिला रहती है, या जहां प्रतिवादी रहता है। उसी जानकारी को रिपोर्ट माना जाएगा।

संरक्षण अधिकारी-

राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन कार्य करने के लिए प्रत्येक जिले में कुछ अधिकारी नियुक्त करेगी, जो संरक्षण अधिकारी कहलायेंगे। जहां तक संभव हो, सुरक्षा अधिकारी महिलाएं होंगी। इन सुरक्षा अधिकारियों को हिंसा की घटना / संभावना के बारे में भी सूचित किया जा सकता है।

सेवा देने वाली संस्था –

कंपनी अधिनियम १९५६ के तहत पंजीकृत कोई भी गैर-सरकारी संस्था, जो इस कानून के तहत काम करने के लिए राज्य सरकार के साथ पंजीकृत है, सेवा प्रदाता संस्था कहलाएगी। सेवा प्रदाता संस्था के भी कुछ अधिकार और कर्तव्य होंगे जिसके तहत वह कार्य करेगी। ऐसी सेवा प्रदाता संस्था को भी हिंसा की घटना की संभावना की सूचना दी जा सकती है।

मजिस्ट्रेट –

जिस थाना क्षेत्र में हिंसा की घटना हुई है, उसके स्थानीय मजिस्ट्रेट या पीड़ित महिला या प्रतिवादी निवास करते हैं, उन्हें भी हिंसा की घटना की सूचना/ रिपोर्ट दी जा सकती है।

घरेलू हिंसा के प्रभाव :-

व्यक्तिगत प्रभाव –

शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और व्यक्तिगत प्रभाव।

पारिवारिक प्रभाव –

इस हिंसा का सीधा असर महिला के काम, निर्णय लेने के अधिकार, परिवार और बच्चों में आपसी संबंधों पर भी देखा जा सकता है।

संस्थागत प्रतिमानात्मक प्रभाव –

इसके कारण दहेज हत्या, हत्या, आत्महत्या में वृद्धि हुई है। कभी-कभी वेश्यावृत्ति की प्रवृत्ति भी इसी वजह से देखी गई है।

अप्रत्यक्ष प्रभाव –

घरेलू हिंसा महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा डालती है। इससे महिलाओं की कार्यक्षमता कम होती है। वह डरी हुई हैं। मानसिक रोगी बन जाता है, जो कभी-कभी पागलपन तक पहुँच जाता है।

संक्षिप्त विवरण :-

महिलाएं शारीरिक, मानसिक, यौनिक रूप से हिंसा का शिकार हो रही हैं और यह हिंसा लगातार बढ़ती ही जा रही है। हिंसा के अनेक कारण हो सकते हैं, जिनमें पितृसत्तात्मक परिवार, संरचना तथा समान समाजीकरण की भूमिका प्रमुख होती है। हिंसा की शिकार महिला की जानकारी आज व्यापक रूप से उपलब्ध है और उत्पीड़ित महिला की जानकारी कोई भी दे सकता है। इसकी जानकारी हम पुलिस, प्रोटेक्शन ऑफिसर को दे सकते हैं।

  • यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा का सामना किया है तो उसके लिये इस डर से बाहर आ पाना अत्यधिक कठिन होता है। अनवरत रूप से घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता हावी हो जाती है। उस व्यक्ति को स्थिर जीवनशैली की मुख्यधारा में लौटने में कई वर्ष लग जाते हैं।
  • घरेलू हिंसा का सबसे बुरा पहलू यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात से वापस नहीं आ पाता है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि लोग या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
  • घरेलू हिंसा की यह सबसे खतरनाक और दुखद स्थिति है कि जिन लोगों पर हम इतना भरोसा करते हैं और जिनके साथ रहते हैं जब वही हमें इस तरह का दुख देते हैं तो व्यक्ति का रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है और वह स्वयं को अकेला कर लेता है। कई बार इस स्थिति में लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं।
  • घरेलू हिंसा का सबसे व्यापक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। सीटी स्कैन से पता चलता है कि जिन बच्चों ने घरेलू हिंसा में अपना जीवन बिताया है उनके मस्तिष्क का कॉर्पस कॉलोसम और हिप्पोकैम्पस नामक भाग सिकुड़ जाता है, जिससे उनकी सीखने, संज्ञानात्मक क्षमता और भावनात्मक विनियमन की शक्ति प्रभावित हो जाती है।
  • बालक अपने पिता से गुस्सैल व आक्रामक व्यवहार सीखते हैं। इस का असर ऐसे बच्चों का अन्य कमज़ोर बच्चों व जानवरों के साथ हिंसा करते हुए देखा जा सकता है।
  • बालिकाएँ नकारात्मक व्यवहार सीखती हैं और वे प्रायः दब्बू, चुप-चुप रहने वाली या परिस्थितियों से दूर भागने वाली बन जाती हैं।
  • प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि हिंसा की शिकार हुई महिलाएँ समाजिक जीवन की विभिन्न गतिविधियों में कम भाग लेती हैं।

समाधान के उपाय

  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि घरेलू हिंसा के सभी पीड़ित आक्रामक नहीं होते हैं। हम उन्हें एक बेहतर वातावरण उपलब्ध करा कर घरेलू हिंसा के मानसिक विकार से बाहर निकल सकते हैं।
  • भारत अभी तक हमलावरों की मानसिकता का अध्ययन करने, समझने और उसमें बदलाव लाने का प्रयास करने के मामले में पिछड़ रहा है। हम अभी तक विशेषज्ञों द्वारा प्रचारित इस दृष्टिकोण की मोटे तौर पर अनदेखी कर रहे हैं कि “महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा और भेदभाव को सही मायनों में समाप्त करने के लिये हमें पुरुषों को न केवल समस्या का एक कारण बल्कि उन्हें इस मसले के समाधान के अविभाज्य अंग के तौर पर देखना होगा।”
  • सुधार लाने के लिये सबसे पहले कदम के तौर पर यह आवश्यक होगा कि “पुरुषों को महिलाओं के खिलाफ रखने” के स्थान पर पुरुषों को इस समाधान का भाग बनाया जाए। मर्दानगी की भावना को स्वस्थ मायनों में बढ़ावा देने और पुराने घिसे-पिटे ढर्रे से छुटकारा पाना अनिवार्य होगा।
  • सरकार ने महिलाओं और बच्चों को घरेलू हिंसा से संरक्षण देने के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 को संसद से पारित कराया है। इस कानून में निहित सभी प्रावधानों का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिये यह समझना ज़रूरी है कि पीड़ित कौन है। यदि आप एक महिला हैं और रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति आपके प्रति दुर्व्यवहार करता है तो आप इस अधिनियम के तहत पीड़ित हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 द्वारा भारत मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर हो गया है, लेकिन इसे और अधिक प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है। नीति निर्माताओं को घरेलू हिंसा से उबरने वाले परिवारों को पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उपलब्ध कराने के लिये तंत्र विकसित करने की ज़रूरत है।
  • सरकार ने वन-स्टॉप सेंटर’ जैसी योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता के लिये चिकित्सीय, कानूनी और मनोवैज्ञानिक सेवाओं की एकीकृत रेंज तक उनकी पहुँच को सुगम व सुनिश्चित करता है।
  • महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये वोग इंडिया ने ‘लड़के रुलाते नहीं’ अभियान चलाया, जबकि वैश्विक मानवाधिकार संगठन ‘ब्रेकथ्रु’ द्वारा घरेलू हिंसा के खिलाफ ‘बेल बजाओ’ अभियान चलाया गया। ये दोनों ही अभियान महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा से निपटने के लिये निजी स्तर पर किये गए शानदार प्रयास थे। 

निष्कर्ष

यदि हम सही मायनों में “महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से मुक्त भारत” बनाना चाहते हैं, तो वक्त आ चुका है कि हमें एक राष्ट्र के रूप में सामूहिक तौर पर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिये। एक अच्छा तरीका यह हो सकता है कि हम राष्ट्रव्यापी, अनवरत तथा समृद्ध सामाजिक अभियान की शुरुआत करें।